पिथौरागढ़ के किसान का कमाल: गाँव की बंजर भूमि को बदला विश्व प्रसिद्ध चाय बागानों में।

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हिमालयी क्षेत्र खेती और भूमि उपयोग काम के लिए बहुत संवेदनशील क्षेत्र है। इन हिमालयी क्षेत्रों में बंजर भूमि का बढ़ना यहाँ की सबसे बड़ी समस्या है। जबकि दूसरी ओर इन पहाड़ी क्षेत्रों में बहुत अधिक बेरोजगारी और पलायन है।यही कारण है कि पर्यटकों के बीच सबसे लोकप्रिय होने के बावजूद भी उत्तराखंड ने अपने खुद के निवासी गवाएं है।
ऐसे में उत्तराखंड को ऐसे लोगों की जरूरत है जो उत्तराखंड के इन सुदूर इलाकों में उम्मीद जगाएं। जो लोग अपनी जमीन की ओर मुड़कर देखे और उसमें से अवसर पैदा करे।उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले के एक प्रगतिशील किसान ने कुछ ऐसा ही किया।


यह कहानी विनोद कार्की की है, जिन्होंने 2011 में अपनी बंजर भूमि को कुछ उपयोगी बनाने का फैसला लिया।
विनोद कार्की बताते है कि उन के पास 400 नलियाँ (8 हेक्टेयर) भूमि अनुपयोगी पड़ी थी। 2010 में, उन्होंने उत्तराखंड चाय बोर्ड के साथ एक समझौता किया, जिसमें कहा गया था कि इसे एक चाय बागान के रूप में विकसित किया जाएगा और अगले सात वर्षों में यहां चाय की पत्तियों की खेती की जाएगी।
2018 में, सात साल पूरे होने के बाद, बोर्ड ने उन्हें चाय बागान लौटा दिया। 2018 में, उन्होंने फिर भारतीय चाय बोर्ड के कोलकाता कार्यालय में संपर्क किया। उनके सहयोग से क्षेत्र के किसानों ने पर्वतीय चाय उत्पादन स्वयत सहकारी समिति का गठन किया और बोर्ड ने उन्हें चाय प्रसंस्करण का लाइसेंस दिया। इसके बाद, उन्होंने एक चाय निर्माण सहकारी इकाई की शुरुवात की।


बेरीनाग ब्लॉक में पाखु छेत्र के नयाल गाँव में एक किसान द्वारा शुरू की गयी इस पहल से आज लगभग 30 किसान जुड़ चुके है। आज के दिन 12 हेक्टेयर में फैला ये छेत्र हर साल लगभग 8000 किलो चायपत्ती का उत्पादन करता है।इस क्षेत्र में उत्पादित चाय जैविक है और इसमें एक विशेष स्वाद और सुगंध है। यह चायपत्ती काली, हरी और छोटी पत्तियों जैसी तीन श्रेणियों में उपलब्ध है।
कोविड-19 के कारण अपने गाँव की तरफ लौटे लोगों के लिए ये इकाई रोजगार के छेत्र में एक आशा की किरण बन के उभरी है।
यही नहीं यूनाइटेड किंगडम से लेकर दुबई तक, इस छोटे से गांव की जैविक चाय अब हर जगह बिक रही है।
एक तरफ जहाँ अकेले पिथौरागढ़ जिले में लगभग 60 गाँव अपना अस्तित्व खो चुके है, वहाँ विनोद कार्की जैसे किसानों द्वारा उठाया गया ये कदम समाज में एक बेहतरीन उदहारण स्थापित करता है।
गांव का वो छोटा सा हिस्सा जहाँ शायद कोई मुड़ कर नहीं देखता, वो आज दुनिया भर में प्रसिद्ध हो चुका है।

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