“बॉर्न टू बी वाइल्ड” कहे जाने वाले इन पक्षियों को क्यों है संरक्षण की जरूरत

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1980 में जहाँ भारत लगभग 40 मिलियन गिद्धों का घर था, 1990 के दशक की शुरुवात में ही इस जनसंख्या में 97% की गिरावट देखी गई, और भारतीय गिद्ध गंभीर रूप से संकटग्रस्त हो गए। शुरुआती दौर में शोधकर्ता इस शानदार जानवर की मौत के कारणों का पता नहीं लगा पाए। गिद्धों के अधिकांश शवों में पाया जाने वाला सफेद चाक जैसा पदार्थ उनके पास एकमात्र संकेत था, जिसे बाद में पता चला कि गिद्ध की अचानक मौत के पीछे का कारण एक नॉन स्टेरॉइडल एंटी इंफ्लेमेटरी दवा (NSAID) का उपयोग था जिसे डाइक्लोफेनाक भी कहा जाता है। इस दवा को नियमित रूप से मवेशियों (Cattles) के इलाज के लिए प्रयोग में लाया जाता है।
दुनिया में गिद्धों की 23 प्रजातियां हैं, और ऑस्ट्रेलिया और अंटार्कटिका को छोड़कर हर महाद्वीप पर कम से कम एक प्रकार का गिद्ध पाया जाता है।ये एक अनुकूलनीय पक्षी हैं जो उपनगरों सहित कई आवासों में पाए जाते हैं, लेकिन उस अनुकूलन क्षमता के साथ भी, इन में से 14 प्रजातियों को संकटग्रस्त ( endangered) माना गया है।

हमारे पर्यावरण के लिए गिद्धों का महत्व:

गिद्ध हमारे पर्यावरण में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। गिद्ध जानवरों के शवों को खा कर food chain के माध्यम से ऊर्जा का बहाव बनाए रखते हैं। हाल के अध्ययनों से पता चला है कि गिद्ध एक प्रभावशाली और पर्यावरण की दृष्टि से बेहतर तरीके से शव को खत्म कर सकते है। चूंकि गिद्ध तेजी से शवों का पता लगाने और उनका सेवन करने में कुशल होते हैं, इसलिए उन्हें लोमड़ियों जैसी स्थलीय प्रजातियों पर प्रतिस्पर्धात्मक लाभ होता है। गिद्धों की अनुपस्थिति में, यह देखा गया है कि जंगली कुत्तों और अन्य ऐसे जानवरों की आबादी बढ़ सकती है और इस कारण रेबीज जैसी बीमारियों के फैलने का खतरा बना रहता है।

भारत में गिद्धों के संरक्षण के लिए शुरू की गयी पहल और योजनाएं:-

2001 में, हरियाणा, पिंजौर में गिद्ध देखभाल केंद्र, मृत्यु दर के कारणों का अध्ययन करने और बीमार पक्षियों के इलाज के लिए स्थापित किए गए थे। 2004 में, BNHS (Bombay Natural History Society) टीम, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञों और सार्वजनिक और निजी संस्थाओं ने गिद्धों को बचाने के लिए एक कार्य योजना बनाई। इसमें एक संरक्षण प्रजनन कार्यक्रम, सुरक्षित NSAID की पहचान करना और डाइक्लोफेनाक के उपयोग को रोकना शामिल था। 2006 में, भारत सरकार ने एक लंबे अभियान के बाद डाइक्लोफेनाक के पशु चिकित्सा उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया और एक वैकल्पिक दवा की खोज की। संरक्षण समूहों के प्रयासों और अंतरराष्ट्रीय भागीदारों के एक संघ, Saving Asia’s Vulture from Extinction जैसे संगठनों के समर्थन के कारण डिक्लोफेनाक का उपयोग काफी कम हो गया है। BNHS ने भारतीय अधिकारियों के साथ एक पंचवर्षीय कार्य योजना शुरू करने के लिए भागीदारी की, जिसमें अधिक प्रजनन केंद्रों और दवाओं का सुरक्षा परीक्षण शुरू हुआ। फिलहाल गिद्धों की स्थिति में सुधार हो रहा है। फरवरी में, इस साल की शुरुआत में, आठ गंभीर रूप से लुप्तप्राय बंदी-नस्ल वाले सफेद-पंख वाले गिद्धों को बेंगल्स बक्सा टाइगर रिजर्व से जंगल में भी छोड़ा गया था।पर गिद्धों की आबादी को केवल इन दवाईयों का खतरा नहीं है। गिद्धों के लिए जहर भी सबसे बड़ा खतरा है, जो मुख्य रूप से उनके द्वारा खाए जाने वाले शवों में विषाक्त पदार्थों जैसे lead के कारण होता है।

अंतरराष्ट्रीय गिद्ध जागरूकता दिवस (IVAD):-

प्रत्येक वर्ष सितंबर में पहले शनिवार को अंतर्राष्ट्रीय गिद्ध जागरूकता दिवस (आईवीएडी) के रूप में नामित किया जाता है और यह गिद्धों और उनके द्वारा प्रदान की जाने वाली पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं के लिए हमारी प्रशंसा दिखाने का एक तरीका है। यह पहल दक्षिण अफ्रीका में लुप्तप्राय वन्यजीव ट्रस्ट के बर्ड्स ऑफ प्री प्रोग्राम और इंग्लैंड में हॉक कंजरवेंसी ट्रस्ट द्वारा संयुक्त रूप से चलाई जा रही है। IVAD का उद्देश्य उन खतरों के बारे में जागरूकता बढ़ाना है जो वर्तमान में गिद्धों का सामना कर रहे हैं और इन प्रतिष्ठित प्रजातियों के समर्थन और संरक्षण के लिए ठोस कार्यों को बढ़ावा देना है।
गिद्धों के संरक्षण का ये सफर अभी बहुत लंबा है पर नामुमकिन नहीं। सही जागरूकता कार्यक्रम और बचाव तरीकों से ये मंजिल हासिल की जा सकती है।

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